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जिलाधिकारी श्री अमन समीर का साक्षात्कार , विद्यार्थी जरूर पढ़े

 


बक्सर पत्रिका / साक्षात्कार : श्री अमन समीर वर्तमान में जिले में बतौर जिलाधिकारी पदस्थापित है। श्री समीर भारतीय लोक सेवा आयोग के 2014  बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी है।  बतौर डीएम बक्सर इनका पहला कार्यक्षेत्र है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र इसरो में बतौर वैज्ञानिक चार वर्ष योगदान दे चुके है।  यह साक्षात्कार मूलतः छात्र-छात्राओं के मार्गदर्शन के लिए किया गया है।  

            साक्षात्कार के सवाल और जवाब 


सवाल : आपने इसरो में बतौर वैज्ञानिक चार वर्षों तक कार्य किया है, इसरो जैसे संस्थान को छोड़कर आईएएस को अपनाया, इसके पीछे का प्रायोजन क्या रहा ?

जवाब : प्रत्येक व्यक्ति का अपना अपना सफर होता है एवं उसमें लिए गए फैसले कहीं ना कहीं उनके पिछले अनुभव से प्रभावित होते हैं। मेरा जो  अनुभव रहा, उसमें मेरी पढ़ाई-लिखाई ग्रामीण परिवेश से ही हुई और प्रशासनिक सेवा में आने का मेरा कोई इरादा नहीं था या यूं कहे कि प्रशासनिक सेवा को लेकर  मन में कोई रोमांच नहीं था। शुरू में मेरा इंजीनियरिंग करके रिसर्च करने का सपना था जो पूरा भी हुआ। लेकिन धीरे-धीरे बाद में व्यक्तित्व विकास के साथ आप अपने अंदर नए आयामों को भी ढूंढने लगते है और अपने आप से बातचीत करते हुए आप पाते है कि कुछ कमी रह गई है। आईआईटी, रुड़की से इंजीनियरिंग के उपरांत अपने प्रोफेशनल पारी की शुरुआत रिलायंस इंडस्ट्रीज से करने के कुछ ही समय बाद इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र) में मेरा चयन हुआ और पहली बार दक्षिण भारत से रूबरू होने का मौका मिला। रिसर्च में आप कुछ विशेष विषयों पर फोकस करते हैं। ऐसा नहीं था कि मैं रिसर्च को एन्जॉय नहीं कर रहा था परंतु 2 वर्ष बाद मुझे महसूस होने लगा कि लोगों से प्रत्यक्ष जुड़ने का मौका नहीं होने के कारण कुछ खालीपन है। संयोगवश उसी समय मेरे एक मित्र का आईएएस में सिलेक्शन हो गया और उनसे लगातार बातचीत  के बाद प्रशासनिक सेवा में आने की रुचि बढ़ने लगी एवं मैंने भी तैयारी शुरू कर दिया। इसरो के माध्यम से भी मैं लोगों की सेवा कर ही रहा था परंतु प्रत्यक्ष रूप से लोगों जुड़ने के सपने के साथ साइंटिफिक क्षेत्र के प्रति रुझान कम होता चला गया।


सवाल : आपने अपनी शिक्षा कहाँ से पूरी की ?

जवाब : मैंने प्रारंभिक शिक्षा गांव से ही पूरी की। मैंने सीबीएसई बोर्ड से माध्यमिक शिक्षा पूरी की। उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पटना साइंस कॉलेज से पूरी की। उसके बाद आईआईटी रुड़की से मैटेरियल साइंस एंड मेटालर्जिकल इंजीनियरिंग से बीटेक किया।

सवाल आपकी पढ़ाई कोचिंग संस्थानों से हुई या सेल्फ-स्टडी ?

जवाब : मैंने मूलतः अपनी पढ़ाई सेल्फ स्टडी के माध्यम से ही की है।
आईआईटी की तैयारी में भी ग्रुप स्टडी और अच्छे मित्रों के कारण कोचिंग की आवश्यकता ज्यादा महसूस नहीं हुई। आईएएस की तैयारी मैंने मूलतः केरल से ही की है। केरल स्टेट सिविल सर्विस अकादमी जो को मूलतः कोचिंग न होकर स्टेट के द्वारा गाइडेन्स देने का संस्थान है, वहीं प्रत्येक रविवार को जाया करता था। कुछ दिनों के लिए अपने लेखन को अच्छा बनाने के लिए दिल्ली में मॉक टेस्ट ज्वाइन किया था।

सवाल : आईएएस की तैयारी में भाषायी ज्ञान का विशेष महत्व है क्या ?

जवाब : भाषा का विशेष महत्व नही है। मायने यह रखता है कि आप जिस भाषा में लिखें, अपने सोंच, विचार को व्यक्त कर पाते है या नहीं। लेकिन निबंध के पेपर में इसका जरा महत्व हो जाता है। भाषा ही आपके संवाद का माध्यम बनती है। अगर भाषा पर आपकी पकड़ हो तो उत्तर प्रभावशाली हो सकता है।

सवाल : कहा जाता है कि अधिकतर अच्छी किताबें अंग्रेजी माध्यम में ही उपलब्ध होती है, इसपर आपका क्या विचार है ?

जवाब : यह आप कुछ विषयों को लेकर कह सकते है कि हिन्दी मे जो किताबें लिखी जाती है वह ज्यादे साइंटिफिक बेसिस पर नहीं लिखी जाती है। हिन्दी माध्यम के छात्र को गुणवत्तापूर्ण जानकारी हिन्दी भाषा मे नहीं प्राप्त हो पाती है। कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी नहीं किया गया है। अगर आप समाचार पत्र की भी बात करें तो हिन्दी के अखबारों में स्थानीय समाचारों का ज्यादा बोलबाला रहता है, जबकि अंग्रेजी के अखबारों में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खबरों की अधिकता रहती है। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर की सोंच को विकसित करने में अंग्रेजी के अखबार मददगार साबित होते है।

सवाल : अर्थ की कमी रहते हुए छात्र प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर सकते है क्या ?

जवाब : अगर छात्र दृढ़संकल्प के साथ है तो अर्थ की कमी रोक नहीं सकती। मैं भी एक बेहद साधारण परिवार से ही आया हूँ। हां, यह बात भी है कि अगर आपके पास अर्थ उपलब्ध है जो कार्य आप एक साल में कर लेंगे, अर्थ की कमी की वजह से उसमें दो साल लग सकता है। अर्थ की कमी की वजह से कुछ चीजों को पता करने में थोड़ा समय लगता है। किसी भी चीज को क़रने के लिए परिकल्पना बनाने की जरूरत होती है जिसमें अर्थ जरा मददगार साबित होता है। लेकिन ऐसा नही है कि अर्थ की कमी आपको रोकेगी। अगर आपको अपना लक्ष्य साफ साफ दिखाई दे रहा है तो अर्थ कभी बाधा नहीं बन सकती है। आसपास ऐसे कई उदाहरण है जहाँ अर्थ की कमी के बाद भी छात्र सफल हुए है।

सवाल : ग्रामीण परिवेश के छात्रों के मूलतः भाषा की ही कठिनाई आती होगी न ?

जवाब : ग्रामीण परिवेश के बच्चों के साथ भाषा रुकावट नहीं है, इसको रुकावट कहना गलत है। उनका मुख्य रुकावट उनका परिवेश होता है। ग्रामीण परिवेश में बच्चों के सपनों को सिंचित नहीं किया जाता। उदाहरण के तौर पर बताना चाहूंगा कि मैं गांव में अक्सर जाता हूँ, तो वहां के बच्चों से बात करता हूँ, मैं जब वहाँ के बच्चों से पूछता हूँ कि क्या बनना चाहते हो, तो कोई यह नही कहता कि डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक बनना चाहता हूँ, वहीं शहरों में यह स्थिति नहीं है। बच्चों को बड़े सपनों से सरोकार कराकर उन्हें प्रेरित करने की आवश्यकता है। गॉंव को सपनों के दृष्टिकोण से बड़ा करने की जरूरत है।

सवाल : छात्रों व अभिभावकों को क्या सन्देश देना चाहते है ?

जवाब : हर छात्र का पोटेंशियल अलग होता है, छात्र पर ज्यादा दबाव देने की जरूरत नहीं है। अभिभावकों को बच्चों की रूचि को देखते हुए उसके अनुरूप प्रेरित करने की जरूरत है। इससे बच्चे अवसादग्रस्त नहीं होंगे और बच्चे अच्छा परिणाम भी देंगे।

सवाल : चलते-चलते, बतौर डीएम आप जिले को क्या देना चाहेंगे ?

जवाब आज मैं जो कुछ भी हूँ उसके पीछे शिक्षा व किताब है। इस चीज को लेकर मैं विशेष फोकस करना चाहूंगा। जिले के ऐसे युवा जो शिक्षा को विशेष महत्व देते है उनको सम्मिलित करते हुए हर प्रखण्ड में कम से कम एक पुस्तकालय खोलने का मेरा लक्ष्य है। पिछले कार्यक्षेत्र में भी मैने कोशिश की थी। वहाँ लोगों ने किताब दान के माध्यम से सहयोग भी किया था। अक्सर देखा जाता है कि फेसबुक, व्हाटसअप आदि के छिछले ज्ञान को लेकर युवा काफी उत्साहित रहते हैं एवं गलत धारणा, गलत सोच के साथी बन जाते है। मेरा प्रयास यही होगा कि एक सकारात्मक माहौल बनाया जाय जिसमें युवाओं में पढ़ने, सोचने समझने की शक्ति का विकास हो। हम सिर्फ युवाओं की सकारात्मक सोच से ही विकास के नए आयामों को पा सकते हैं।

साक्षात्कारकर्ता : सर्वेश कुमार पाण्डेय ( संपादक , बक्सर पत्रिका )